बड़ा सवाल : ईमानदार मुख्यमंत्री के कार्यालय में क्यों रुकी गलत तरीके टीडी हासिल करने वाले प्रभावशाली पूर्व आईएएस अधिकारियों पर कार्रवाई की फाइल, गैर कृषक होकर ही टीडी लेकर काटे देवदार के पेड़

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शिमला. मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को सरकार और भाजपा ईमानदार मुख्यमंत्री के रुप में प्रचारित करती है। करना भी चाहिए क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद जयराम ठाकुर पर सीधे तौर पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं लगे हैं, मंत्रियों और अधिकारियों पर भले ही लगते रहे। लेकिन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की ईमानदारी पर सवाल तब उठते हैं धोखाधड़ी कर गलत तरीके से टीडी लेने वाले पूर्व आईएएस अधिकारियों पर कार्रवाई करने की फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय में महीनों तक दबी रहे। आखिर क्या कारण है कि सरकार के मंत्री ने ही इस मामले में पूर्व आईएएस अधिकारियों के द्वारा ली गई टीडी को गलत करार देकर कार्रवाई की सिफारिश की है। लेकिन अभी तक इसमें कोई कार्रवाई नहीं की गई है। सूत्रों की माने तो यह फाइल लंबे समय से मुख्यमंत्री कार्यालय में है लेकिन अग्रिम कार्रवाई के लिए अभी बाहर नहीं आई है। अगर किसी आम आदमी ने ऐसा किया होता तो तत्काल उस पर धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो जाता लेकिन पूर्व आईएएस अधिकारियों के खिलाफ अभी तक कुछ नहीं हुआ।
गलत तरीके से टीडी लेने का मामला पूर्व आईएएस अधिकारी अभय शुक्ला और दीपक शानन का है। यह दोनों आईएएस अधिकारी रहे हैं जिनको राजस्व कानूनों का अच्छा ज्ञान हैं। यह दोनों अधिकारी जिले के डीसी भी रहे हैं और संभव है कि अपने लंबे कार्यकाल में राजस्व विभाग के सचिव भी रहे होंगे। नहीं भी रहे होंगे तब भी ऐसा नहीं है कि इन आईएएस अधिकारियों को प्रदेश के राजस्व नियम और धारा 118 के बारे में ज्ञान न रहा है। प्रदेश के राजस्व कानून की धारा 118 वह है जिसके तहत हिमाचल प्रदेश के बाहर के लोगों को हिमाचल में जमीन खरीदने के लिए स्वीकृति दी जाती है। धारा 118 के तहत हिमाचल में जमीन खरीदने की अनुमति कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही मिलती है। यह किसी को मिले या न मिले लेकिन आईएएस अधिकारियों को मिल ही जाती है। प्रदेश में ऐसे दर्जनों गैर हिमाचली आईएएस अधिकारी हैं जिन्होंने धारा 118 के तहत अनुमति लेकर हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीदी है।
इन दोनों पूर्व आईएएस अधिकारियों ने सरकार से धारा 118 में अनुमति लेकर शिमला जिले की मशोवरा के मूलकोटी में जमीन खरीदी। राजस्व नियमों में यह स्पष्ट है कि धारा 118 के तहत जमीन खरीदने वाला व्यक्ति हिमाचली कृषक नहीं बन सकता वह गैर कृषक ही रहेगा। फारेस्ट विभाग के नियमों में यह है कि टीडी के तहत पेड़ लेने का अधिकार केवल हिमाचल कृषक को ही है। नियमों की जानकारी होने के वाबजूद दोनों अधिकारियों ने टीडी के लिए आवेदन किया। राजस्व विभाग की रिपोर्ट के आधार पर वन विभाग ने भी टीडी अधिकार के तहत दोनों अधिकारियों को देवदार के पेड़ काटने की अनुमति दे दी, जिसकी लकड़ी मकान बनाने में उपयोग की गई। मामला उठने पर पूरे मामले की जांच की गई। वन विभाग ने अपनी जांच में पाया कि राजस्व विभाग की रिपोर्ट में कहीं यह नहीं दर्शाया गया कि उपरोक्त दोनों अधिकारी गैर कृषक हैं। जिससे वन विभाग के अधिकारियों ने टीडी के तहत देवदार के पेड़ काटने की अनुमति दी है। वन विभाग की जांच में यह स्पष्ट कहा गया है कि दोनों अधिकारियों ने गलत तरीके से टीडी अधिकार का उपयोग किया है।
वन विभाग ने अपनी रिपोर्ट सरकार के समक्ष सौंप दी है। वन विभाग की जांच रिपोर्ट 27 जून 2020 को चीफ कंजरवेटर ऑफ फारेस्ट की ओर से एडिशनल चीफ सेकेट्री फारेस्ट को भेजी गई है। सूत्रों के अनुसार वन मंत्री ने रिपोर्ट के आधार पर दोनों अधिकारियों के खिलाफ अग्रिम कार्रवाई के लिए फाइल मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी है। लेकिन अभी तक मुख्यमंत्री कार्यालय से इस मामले में अग्रिम कार्रवाई बारे कुछ आदेश नहीं आए हैं। नियमों के अनुसार जानबूझकर धोखे से टीडी राइट लेने पर धोखाधड़ी का मामला धारा 420 के तहत होने चाहिए। संभव हो कि वन मंत्री ने भी मुख्यमंत्री के समक्ष धोखाधड़ी का मामला दर्ज करने की सिफारिश की होगी। लेकिन अब देखना है कि मुख्यमंत्री कब इन अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का आदेश देते हैं।